राजीव रंजन
इस वाकये से किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति का संबंध नहीं है। अगर ऐसा है तो महज इत्तेफाक है और दुनिया में इत्तेफाक होते ही रहते हैं। हमारा इरादा किसी का दिल दुखाने का नहीं है। वैसे दिल है, तो दुखेगा ही। चचा गालिब बहुत पहले कह गए हैं- ‘मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यूं।’
खैर, आइए किस्से पर आते हैं। सच्चे किस्सागो की तरह किस्से से पहले आपको जगह, तारीख और लोकेशन के बारे में बता दें। वैसे ये तफ्सील केवल पहले सीन की है। उसके बाद का आप खुद समझ जाएं तो बेहतर, अगर नहीं समझे तो कोई हर्ज भी नहीं है।
स्थान- जोहांसबर्ग/मुंबई तारीख- 24 मई 2009
लोकेशन- आउटडोर/इनडोर
उधर जोहांसबर्ग के न्यू वांडरर्स स्टेडियम में डेक्कन चार्जर्स और रॉयल चैलेंजर्स के बीच आईपीएल-2 का खिताबी मुकाबला चल रहा था। इधर अपने जन्नत जैसे ‘मन्नत’ में बादशाह बुझे मन से बैठे थे, टीवी बंद किए हुए। बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे। सोच रहे थे कि मेरी बारी कब आएगी। अब आप सोच रहे होंगे कि बैठे थे तो चहलकदमी की बात कहां से आ गई। अब भई, बात तो सीधी सी है। आदमी बेचैन होता है तो मुद्राएं पल-पल बदलती रहती हैं। सो, बादशाह के साथ भी ऐसा ही था। दुख की वजह से टीवी बुझा के बैठे थे, चहलकदमी कर रहे थे। पिछले साल अपने से नीचे रही टीमों के बीच खिताबी मैच देखने को मन नहीं कर रहा था।
आखिर अंत में उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। सोचा, चलो रिजल्ट ही देख लें। टीवी खोला तो अंतिम गेंद फेंकी जा रही थी। जैसे ही अंतिम गेंद फेंकी गई, अचानक खुशी से उछल पड़े। बेसाख्ता मुंह से निकल पड़ा- अब मेरी बारी आ गई। तुरंत दुनिया के सबसे महंगे घर का नंबर मिलाया। उधर मैम ने फोन उठाया और कहा- हैलो। इधर से बादशाह बोले- मैम कल मैं आपको मिठाई खिलाने के लिए आना चाहता हूं। आप घर पर कब मिलेंगी? मैं इतना ख...ख...खुश हूं कि आज ही आना चाहता था, लेकिन रात बहुत हो गई है, इसलिए मन मसोस कर रह जाना पड़ रहा है। उधर से मिलने का टाइम पा कर बादशाह ने फोन रख दिया और गाने लगे- पल पल कैसे कटेगा ये पल... और पल नहीं कटने की बेचैनी में फिर घूमने लगे। लेकिन, इस बार की बेचैनी दूसरे टाइप की थी।
राम-राम, अल्ला-अल्ला करके (मैं सेक्यूलर किस्म का बंदा हूं, इसलिए किसी को इग्नोर नहीं करना चाहता) किसी तरह सुबह हुई और अपनी आई-10 लेकर दुनिया के सबसे महंगे घर पहुंच गए। वहां जाकर मैम को मिठाई खिलाते, इससे पहले मैम ने सवाल दाग दिया- मेरी समझ में नहीं रहा कि तुम आठवें नंबर पर रहे और मैं सातवें नंबर पर। फिर ये मिठाई क्यों और सबसे पहले मुझी को क्यों? बादशाह बोले- यही तो सवाल का जवाब है। आप बताइए इस बार फाइनल खेलने वाली टीमें पिछली दफा कितने नंबर थीं? मैम बोली- सातवें और आठवें नंबर पर। बादशाह चहक कर बोले- तो फिर अगली बार फाइनल किसके बीच होगा? (हालांकि बादशाह चहकने की असली वजह मन में ही दबा गए)
मैम भी चहक कर बोली- अरे हां, तुम्हारा गणित तो बड़ा ही मजेदार है। बड़ा ही सुकून देने वाला है। इसने हार की कड़वाहट को बिल्कुल मिटा दिया। मैम के मुंह से तारीफ के बोल सुन, अपनी खुशी मन में समेटे बादशाह अपने जन्नत जैसे ‘मन्नत’ लौट गए। उनके जाते ही मैम ने अपनी टीम के कप्तान बाबा को फोन किया। बादशाह के गणित के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा- अगली बार तो हमारा फाइनल में जाना पक्का है। उधर से बाबा बोले- मैम बादशाह नहीं कह के भी जो आपको कह गए, वो शायद आप समझी ही नहीं। मैम बोली- क्या? बाबा बोले- वो कह गए हैं कि उनकी टीम आठवें नंबर पर थी, इसलिए गणित के हिसाब से अगली बार टूर्नामेंट जीतने की बारी उनकी है।
जब असली बात मैम की समझ में आई तो उनका मुंह खुला का खुला रह गया। अनायास मुंह से निकल गया- इससे तो अच्छा था कि मेरी ही टीम अंतिम नंबर पर रहती।
नोट: इस वाकये की जानकारी बाबा ने फोन करके न्यूजीलैंड में आराम फरमा रहे बादशाह की टीम के कप्तान ‘माइ के लालम’ को दी। जैसे ही उन्होंने सारी बात सुनी, बोल पड़े- मेरा नंबर तो गया। बाबा ने कहा- मैंने तुम्हे खुशी की खबर सुनाई और तुम कह रहे हो कि नंबर गया! माइ के लालम छूटते ही बोले- पिछली बार हार के बाद दोनों टीमों के कप्तान बदल दिए गए। आप तो बाबा ठहरे, आप को कुछ कहने की कुव्वत किसी में नहीं है। मगर मैं तो गया। बाबा भी सोच में पड़ गए। मैं भी सोच रहा हूं- दिल को खुश रखने को गालिब ये ख्याल (बादशाह वाला) अच्छा है।